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कर्तव्य-बोध: राष्ट्र-निर्माण की खोई हुई कड़ी
अधिकारों की चेतना लोकतंत्र की आधारशिला है, लेकिन जब अधिकार कर्तव्य से अलग हो जाते हैं, तो नागरिक स्वतंत्रता व्यक्तिगत दावे में बदल सकती है। दुर्योधन की कथा से लेकर संविधान के मौलिक कर्तव्यों तक, यह लेख उस खोई हुई कड़ी की तलाश करता है जो नागरिक चरित्र, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र-निर्माण को जोड़ती है।

दुर्योधन ! महाभारत का यह पात्र भारतीय स्मृति में प्राय: अहंकार, ईर्ष्या और हठ के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था - साहस, नेतृत्व, मित्रता निभाने की क्षमता और अपने पक्ष के लिए दृढ़ता। प्रश्न यह है कि यदि इन गुणों के साथ उसके भीतर कर्तव्य-बोध भी उतनी ही गहराई से विकसित हुआ होता, तो क्या उसकी कहानी अलग हो सकती थी?
यह प्रश्न केवल महाभारत का नहीं, अपितु आज के समाज का भी है।
हम अपने बच्चों को अधिकारों के बारे में बताते हैं - उन्हें क्या मिलना चाहिए, उनके साथ क्या अन्याय नहीं होना चाहिए और वे अपने अधिकारों के लिए कैसे आवाज उठाएं। यह आवश्यक है। लेकिन क्या हम उतनी ही गंभीरता से उन्हें यह भी सिखाते हैं कि उनके अधिकारों के साथ दूसरों के प्रति कौन-से कर्तव्य जुड़े हैं?
मूल सिद्धांत
किसी भी समाज में अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के परस्पर पूरक होते हैं। अधिकार व्यक्ति को गरिमा देते हैं; कर्तव्य उस गरिमा को दूसरों की गरिमा के साथ जीना सिखाते हैं।
संविधान से आगे एक कर्तव्य का संसार
भारत का संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है। अनुच्छेद 51A में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है। संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान, पर्यावरण की रक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और सद्भाव को बढ़ावा देना - जो केवल संवैधानिक शब्द नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता के आधार भी हैं।
लेकिन नागरिक कर्तव्य की सीमा संविधान के पन्नों पर समाप्त नहीं होती। एक व्यक्ति का परिवार के प्रति कर्तव्य, पड़ोसी के प्रति उसका व्यवहार, समाज के प्रति उसकी संवेदनशीलता, अपने पेशे में उसकी ईमानदारी और प्रकृति के प्रति उसका दायित्व - ये सभी मिलकर उसके नैतिक जीवन का निर्माण करते हैं।
राष्ट्र-निर्माण का सबसे छोटा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण संस्थान संसद या सरकार नहीं, परिवार है। वहीं से नागरिक चरित्र की पहली पाठशाला शुरू होती है।
परिवार से शुरू हो कर्तव्य की शिक्षा
माता-पिता और बुजुर्गों की देखभाल केवल हमारी परंपरा नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी है। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना पर्याप्त नहीं; उन्हें ईमानदारी, संवेदनशीलता, करुणा, अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी का व्यवहारिक पाठ पढ़ाना भी उतना ही आवश्यक है।
परिवार के भीतर भी कर्तव्य एकतरफा नहीं हो सकता। माता-पिता का बच्चों के प्रति दायित्व है, तो बच्चों का माता-पिता के प्रति। पति-पत्नी के बीच अधिकार हैं, तो परस्पर सम्मान और सहयोग के कर्तव्य भी हैं। परिवार में महिलाओं और पुरुषों की समान गरिमा स्वीकार करना, घरेलू जिम्मेदारियों में सहभागिता और मतभेदों को हिंसा या अपमान के बजाय संवाद से सुलझाना - यही कर्तव्य-बोध का वास्तविक रूप है।
यदि परिवार में बच्चे “मुझे क्या मिलेगा?” से पहले “मेरी जिम्मेदारी क्या है?” यह पूछना सीखते हुए बड़े हों, तो इसका प्रभाव उनके पूरे सामाजिक व्यवहार पर पड़ेगा।
समाज में सभ्यता कानून से पहले आती है
हम अक्सर नागरिक शिष्टाचार को मामूली विषय समझकर नजरअंदाज करते हैं। लेकिन कतार में अपनी बारी का इंतजार करना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना, बिना आवश्यकता हॉर्न न बजाना, सार्वजनिक स्थान पर कचरा न फेंकना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचाना - ये छोटी बातें नहीं हैं। ये उस सामाजिक चरित्र के संकेत हैं जिसमें व्यक्ति समझता है कि सार्वजनिक स्थान किसी 'दूसरे' का नहीं, हम सबका है।
इसी प्रकार जाति, धर्म, भाषा, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव से बचना, पड़ोसी के सुख-दुख में साथ खड़ा होना और जरूरतमंद की सहायता करना समाज को केवल अधिक मानवीय नहीं बनाता, बल्कि अधिक स्थिर भी बनाता है।
आज डिजिटल दुनिया में जिम्मेदारी का एक नया आयाम भी जुड़ गया है। बिना पुष्टि किए किसी अफवाह को आगे बढ़ाना, भड़काऊ संदेश साझा करना या किसी व्यक्ति के बारे में अपुष्ट सूचना फैलाना भी सामाजिक दायित्व के उल्लंघन का आधुनिक रूप है। सोशल मीडिया पर 'फॉरवर्ड' करने से पहले तथ्य जांच लेना भी नागरिक कर्तव्य है।
कर्तव्य-बोध का अर्थ आत्म-अनुशासन भी है
समाज को बदलने की शुरुआत हमेशा किसी कानून से नहीं होती। कई बार वह व्यक्ति के भीतर से शुरू होती है। ईमानदारी से अपना काम करना, रिश्वत और धोखाधड़ी से बचना, क्रोध और पूर्वाग्रहों पर नियंत्रण रखना, अपनी गलतियों को स्वीकार करना और निरंतर स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करना - ये व्यक्तिगत नैतिकता के प्रश्न हैं।
इसी तरह समाज के गरीब, वंचित, वृद्ध और दिव्यांग लोगों के प्रति संवेदनशीलता केवल दया नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की स्वीकृति है।
एक ऐसा समाज जिसमें हर व्यक्ति केवल अपने हित की रक्षा करे, वैसा समाज समृद्ध तो हो सकता है, लेकिन शायद सुखी नहीं। स्थायी समृद्धि के लिए सामाजिक विश्वास आवश्यक है और सामाजिक विश्वास कर्तव्य-बोध से पैदा होता है।
प्रकृति के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है
कर्तव्य केवल मनुष्यों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता। पानी और बिजली की बर्बादी रोकना, भोजन व्यर्थ न करना, एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचना, पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना तथा पशु-पक्षियों के प्रति अनावश्यक क्रूरता से बचना - ये पर्यावरणीय जिम्मेदारियां हैं। यदि हम अपने हिस्से की छोटी-सी जिम्मेदारी भी नहीं निभाते, तो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा का संकल्प स्वतः खोखला हो जाता है।
क्या कर्तव्य-बोध मुकदमों को कम कर सकता है?
देश में न्यायालयों पर लंबित मामलों का भारी बोझ किसी एक कारण से पैदा नहीं हुआ है। इसमें न्यायिक, प्रशासनिक, आर्थिक, प्रक्रियात्मक और सामाजिक - कई स्तरों के कारण शामिल हैं। इसलिए यह कहना सर्वथा उचित नहीं होगा कि केवल कर्तव्य-भावना के कारण न्यायालयों में मुकदमे समाप्त हो जाएंगे।
लेकिन, एक प्रश्न अवश्य पूछा जा सकता है: कितने विवाद ऐसे हैं जिन्हें अदालत तक पहुंचने से पहले परिवार, पड़ोस या समुदाय के स्तर पर संवाद, समझौते और पारस्परिक जिम्मेदारी से सुलझाया जा सकता था?
संपत्ति का विवाद केवल संपत्ति का विवाद नहीं होता; वह अक्सर भाई-भाई, माता-पिता और संतान या अन्य रिश्तेदारों के बीच विश्वास का संकट बन जाता है। यदि परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अधिकार के साथ दूसरे के अधिकार और अपनी जिम्मेदारी को भी देखे, यदि विवाद में जीतने से पहले संबंध बचाने की कोशिश हो, यदि पड़ोसी अपने छोटे-से मतभेद को वर्षों की दुश्मनी में न बदलें - तो अनेक विवाद मुकदमे बनने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं। न्यायालयों का बोझ कम करने की शुरुआत न्यायालय के बाहर भी हो सकती है - हमारे घरों और हमारे व्यवहार से।
अधिकार मांगने से पहले कर्तव्य पूछना होगा
इसका अर्थ यह कतई नहीं कि नागरिक अपने अधिकारों की मांग करना छोड़ दें। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। अधिकारों की रक्षा के बिना स्वतंत्रता और गरिमा की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन अधिकारों की मांग को जिम्मेदारी से जोड़ना होगा।
▪ यदि हम स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण का दायित्व भी स्वीकार करना होगा।
▪ यदि हम सुरक्षित सड़क चाहते हैं, तो यातायात नियमों का पालन भी करना होगा।
▪ यदि हम सम्मान चाहते हैं, तो हमें दूसरों को सम्मान देना भी होगा।
▪ यदि हम न्याय चाहते हैं, तो अपने व्यवहार में निष्पक्षता भी लानी होगी।
▪ और यदि हम परिवार से अपने अधिकार चाहते हैं, तो परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा।
यही अधिकार और कर्तव्य के बीच का वास्तविक संतुलन है।
कर्तव्य-बोध भाषण से नहीं, व्यवहार से आएगा
कर्तव्य को पाठ्यपुस्तक के किसी अध्याय या सरकारी अभियान तक सीमित रखने की बात नहीं बनेगी। इसकी शुरुआत उदाहरण से नेतृत्व करने से होगी। बच्चा अपने पिता को ट्रैफिक नियम का पालन करते देखे; अपने माता-पिता को बुजुर्गों की देखभाल करते देखे; परिवार में महिलाओं और पुरुषों को समान सम्मान मिलता देखे; किसी पड़ोसी की कठिनाई में परिवार को उसके साथ खड़ा देखे; किसी अफवाह को आगे बढ़ाने के बजाय तथ्य की जांच होते देखे; सार्वजनिक स्थान पर कचरा डस्टबिन में जाता देखे। तब कर्तव्य सिर्फ किताब का विषय न रहकर, जीवन का संस्कार बनेगा।
आत्म-मंथन: दिन के अंत में 2 मिनट के 3 प्रश्न
✦ आज मैंने अपने परिवार के लिए क्या किया?
✦ आज मैंने अपने समाज के लिए क्या किया?
✦ आज मेरे किसी व्यवहार से किसी दूसरे व्यक्ति को लाभ हुआ या नुकसान?
शायद यही दो मिनट का आत्म-मंथन धीरे-धीरे सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत बन जाए।
राष्ट्र-निर्माण की शुरुआत घर से
राष्ट्र केवल सीमाओं, संस्थानों और सरकारों से नहीं बनता। राष्ट्र करोड़ों परिवारों, रिश्तों, पड़ोसियों और रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है। इसलिए यदि हमें दीर्घकालिक समृद्धि के साथ स्थायी सामाजिक सुख चाहिए, तो हमें अधिकारों के साथ कर्तव्य की संस्कृति विकसित करनी होगी।
परिवार के प्रति कर्तव्य रिश्तों को बचाएगा। समाज के प्रति कर्तव्य विश्वास बढ़ाएगा। व्यक्तिगत नैतिकता भ्रष्टाचार और छल को कम करेगी। प्रकृति के प्रति कर्तव्य भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित करेगा। और जिम्मेदार नागरिकता लोकतंत्र को अधिक परिपक्व बनाएगी।
अधिकार हमें स्वतंत्र बनाते हैं, लेकिन कर्तव्य हमें सभ्य बनाते हैं। अधिकार व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करते हैं, लेकिन कर्तव्य समाज के विश्वास की। और जब परिवार तथा समाज के प्रति कर्तव्य हमारे जीवन का स्वभाव बन जाएं, तभी समृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं रहेगी - वह सुख, शांति और सामाजिक सद्भाव में बदल जाएगी।
*राष्ट्र-निर्माण की वह खोई हुई कड़ी शायद किसी दूर की नीति में नहीं, हमारे अपने घर से शुरू होने वाले कर्तव्य-बोध में छिपी है।*

Author
Shashank Shrivastava
I work at the intersection of social work practice and public policy research. Over the last decade my work has moved between village-level implementation and the evaluation frameworks that decide whether such implementation is judged a success.
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